Wednesday, December 31, 2008

क्या हो नए साल का नया संकल्प ?

लीजिये, एक और नया साल आ ही गया. दर असल ३६५ दिनों के बाद केलेंडर तो एक और नया साल लेकर आएगा ही. हर साल ऐसा ही होता है. लेकिन क्या सिर्फ केलेंडर के बदलने से नए साल की औपचारिकता पूरी हो जानी चाहिए ? काश ऐसा न हो तो कितना अच्छा होगा ? इस कड़वी सच्चाई को जानने के बावजूद हममे से ज्यादातर लोग यही करते है की नए साल के आगमन पर हफ्ते- दो हफ्ते बहुत उत्साह दिखाते है की ऐसा करेंगे, वैसा करेंगे. लेकिन जनवरी महीने के गुजरते तक नए सल् कसार जोश सोडावाटर के उफान की तरह शांत हो जाता है. बहुत बिरले ही ऐसे होंगे जिनको अपने नए साल के संकल्प याद रहते है. और उनमे से भी गिने-चुने ऐसे होंगे जिनमे अपने संकल्प को पूरा करने की जिद वर्ष के अंत तक कायम रहती है. सच तो यह है की दुनिया वास्तव में उन्ही गिने-चुने लोगों की बदौलत चल रही है जिन्हें न सिर्फ अपने संकल्प याद रहते है, बल्कि जो अपने संकल्पों को पूरा करने के लिए शिद्दत से कोशिश भी करते हैं. हर समाज में यह ज़िम्मेदारी युवाओं पर ही होती है की वे कोई सकारात्मक परिवर्तन लायें. लेकिन युव होने का अर्थ क्या सिर्फ २० से ३० साल के उम्र का होना है? कतई नहीं. युवा होने का सही मतलब तो ऐसे लोगों से है, जिनके पास संकल्प को पूरा करने का सामर्थ्य हो, और जो विचारों से सकारात्मक हों. अगर केवल जोश और गति होगी लेकिन दिशा सही नहीं होगी तो ऐसे शारीरिक युवाओं से देश और समाज का भला नहीं होने वाला है. भारत के सन्दर्भ में तो एक विचारक का यहाँ तक कहना है कि भारत में कोई भी नौ जवान नागरिक तब तक सच्चे अर्थों में युवा कहलाने का पात्र नहीं है जब तक उसने भगत सिंह के बारे में नहीं पढ़ा हो. आज भारत को एक बार फिर ऐसे ही युवाओं कि जरुरत है को शक्ति में युवा हो और विचारों में परिपक्व हों, तभी देश को सुरक्षित मन जा सकता है, वर्ना, कोई भी बाहरी ताकत भारत को कमज़ोर करने के लिए आतंक पैदा करती रहेगी.-----

नवा साल के खुसी तो बने हे, फेर...

नवा साल के खुसी तो बने हे, फेर...

आज ले नवा साल सुरु होवत हे। अइसन मा खुसी तो होना चाही। औ होही काबर नई ? कोणी भी नवा बात के सत्कार करे के तो हमर इहाँ चलन बहुते पुराना हे. फेर एहू देखे जाथे के नवा साल के नांव लेके जवान मनखे मन कुछु जादाच मेछरात रहिथें. कोनो दूसर के खियाल तको नई रखें. अइसन नई होना चाही. कतको घांव एहू देखे जाथे के खुसी के निसा मा माते लोगन मन आजू-बाजू रेगैया ला तको धक्का-मुक्की करे मा पाछू नई रहें. का अपन खुसी में दूसर के खियाल नई रखना कोनो फेसन आय ? जौन मनखे मन अपन संगे-संग दूसर के खियाल घलो रखथे उनखर ऊपर सब्बो झिन के दया-मया होथे. एही सोंच के आज सब्बो झिन अपन नवा साल ला मनावें, तो बने होनी. हमर छत्तीसगढ़ के अइसने चलन हे के अपन खुसी ला मनाये के बेरा मा दूसर के दुःख पीरा ला घलो कमती करे के उपाय हो सके, तो खुसी गाडा-गाडा असन बाढ़ जाथे.

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Monday, December 29, 2008

रईपुर के टेसन म लगत हे केमरा

रईपुर के टेसन म लगत हे केमरा

जब ले मुंबई म आतंकवादी मन हमला करें हवें, तभे ले सब्बो डाहर पुलिस और सरकार मन चेत गे हें की अभीच ले सुरछा के इन्तिजाम करे बार पढ़ी, नई तो कभू भी कोनो किसम के अलहन आ जाही. एही सोंच के रईपुर के टेसन म आजकाल केमरा लगाए जात हे. अब कोनो बीडी पिये चाहे माखुर खाय, ओखर फोटू कमरा म आ जाही, जेला बाद म कोनो भी बड़े साहब मन देख के खोज-बीन घलो कर लिहीं. एही पाए के अईसे कहे जाते कि अब कहूँ टेसन जाना होही तौ बने असन धियान लगा के जाना बने रही. का पता कहूँ कोनो चोर उचक्का किंजरत होही औ अपन बात-बानी माँ फंसा लिही, तौ वईसने परसानी हो जाही. इकहरे संगे-संग एहू काम करे जा सकते कि कहूँ कोनो मनखे के चाल-चलन बने नहीं दिखिस तो तुरते ओखर रपोट पुलिस करा लिखा दे जाए, औ नई होईस तौ कोनो बड़े साहब ला सरेख दे जाए. एखर ले हमर सहर के सुरछा तो बने रही.----

बस्तर में नए राजस्व ग्रामो का उदय

बस्तर में नए राजस्व ग्रामो का उदय

छत्तीसगढ़ में बस्तर को हमेश से ही पिछड़ा इलाका मन जाता रहा है। लेकिन डॉ रमन सिंह की पिछली सरकार ने अबूझमाड़ के दुर्गम इलाको का हवाई सर्वे कराकर एक इस बीहड़ इल्काके में एक नयी शुरुआत की थी. अब रमन सिंह के अपनी सुश्री पारी में एक बार बस्तर को विकास के रास्ते पर आगे बढाने के लिए बस्तर में नए राजस्व ग्राम बनाने की पहल की है. राज्य सरकार के ताजा फैसले के अनुसार बस्तर में बीस से तीस किलोमीटर के दायरे में फैले वन ग्रामो को समेटकर वहां की आबादी के अनुसार छोटे छोटे राजस्व ग्राम बनाए जायेंगे, ताकि वहां का समग्र विकास हो सके. यह निश्चित रूप से एक क्रांतिकारी कदम है. आम तौर पर सरकार उन्ही फैसलों को मीडिया में महत्त्व या प्रचार मिलता है, जिनमे कोई राजनीतिक समीकरण होता है, लेकिन रमन सरकार का यह फैसला भी दीर्घ काल में राजनीतिक दृष्टि से महत्वपूर्ण साबित होगा. छोटे छोटे राजस्व ग्राम बन्ने से वहां के लंबित मामलो का निपटारा भी सम्बंधित तहसील या विकासखंड स्टार पर होने लगेगा. इससे गाँव के लोगों को अनावश्यक दूर-दूर पैदल चलकर जाना नहीं पड़ेगा. रमन सरकार ने अपने प[इछ्ले कार्यकाल में भी अबूझमाड़ के दुर्गम इलाके का हवाई सर्वे कराकर एक उल्लेखनीय कार्य किया था. अब इसी इलाके के वन ग्रामो को राजस्व ग्राम में बदलने के कदम को भी दूरगामी फैसले के रूप में देखा जाना चाहिए. जब ये वन ग्राम राजस्व ग्राम के रूप में पंचायत के बजट का पर्याप्त हिस्सा प्राप्त करने लगेंगे तो वहां विकास की जाती भी अपने आप तेज होने लगेगी. राजस्व ग्राम बनने से इन गांवों में शिक्षा , स्वास्थ्य, कृषि, और बुनियादी सुविधाएँ भी बढ़ने लगेंगी. यदि राज्य सरकार अपने इस फैसले को सही ढंग से लागो करने में सफल रही तो आने वाले दो-तीन वर्शोने में ही बस्तर के ग्रामीण इलाकों की तस्वीर बदल जायेगी- ऐसी उम्मीद की जा सकती है.

Sunday, December 28, 2008

शिक्षाकर्मी मन के नवा जोस

शिक्षाकर्मी मन के नवा जोस

छत्तीसगढ़ माँ एक घांव फेर भाजपा के सरकार बने ले शिक्षाकर्मी मन के जोस बाढ़ गे हे। पाछु सरकार रहत ले कतको बेर शिक्षाकर्मी मन के तनखा बढे रिहिस. फेर शिक्षाकर्मी मन संविलयन के मांग करे बार अपन आन्दोलन सुरु करैया हें. ओमन के सुभिस्ता अतका जरुर हे कि अब पंचायत मंत्री बदल गे हे. रामविचार नेताम ला शिक्षाकर्मी मन जौन समझा लेहीं तो ओमन के मांग घलो पूरा हो जाही. दूसर कोटि भाजपा सरकार के हालत अइसन नई हे कि अब वो घेरी-बेरी शिक्षाकर्मी मन के आन्दोलन ला चलन दे. जतका जल्दी एमन के मांग ला पूरा करही, ओतके जल्दी ओखर मुडी ले एक ठन पीरा कमती होही. अउ अब तो भाजपा सरकार के खजाना माँ पैसा घलो बनेच असन हवे, तौ फेर कोन बात के चिंता फिकिर होही ? शिक्षाकर्मी मन ला ताको सरकार के भरी खजाना के खबर लग गे हे तैसे लागथे. तभे तो ओहू मन सरकार बनत देरी नई अपन आन्दोलन ला सुरु कर दे हवें. नवा-नवा सरकार हे, तो कोनो नई चाही कि सुरूच माँ कोनो किसम के हो-हल्ला होए. एही बात के फायदा शिक्षाकर्मी मन ला मिल सकत हे.---- -----

----- किन्नर मन के दुआ चाही छत्तीसगढ ला

----- किन्नर मन के दुआ चाही छत्तीसगढ ला
पाछू एक हफ्ता ले रईपुर माँ देस के दुरिहा- दुरिहा ले किन्नर मन के जमघट लगे हे . एहू बताए गे हे कि एमा एक झिन किन्नर हा बिदेस ले घलो आए हे. ऐसे कहे जाथे कि किन्नर मन के आसिरबाद ले के कोनो भी मनखे अपन सब्बो दुःख पीरा ला कम कर सकथे. आज के बेर माँ तो एही कहे जाही कि रईपुर और जम्मो छत्तीसगढ ला अपराध औ चोरी- हारी ले बचाय के जरुवत सबले जादा हे. अब एला का कहे जाये कि एक कोती सहर माँ हफ्ता भर ले किन्नर मन के बैठका होवत हे, औ इकहरे संगे-संग रईपुर माँ तोप के गोला पकडा गिस. अतकेच नई, राज्य माँ पहिली ले नक्सली समस्या बिकराल होवत जात हे. एखरो बार किन्नर मन ला दुआ करना चाही. का पता किन्नर मन के दुआ लगे ले ए समस्या सदा दिन बार खतमेच हो जाही, अउ इहाँ के नक्सली मन घलो नेपाल असन चुनाव लड़े बार तियार हो जाहीं ? जब अतेक असन दुआ के बिचार आवत हे तो एहू काबर नई सोंचे जाए कि छत्तीसगढ असन नवा राज्य ले बेमानी अउ लम्पटगिरी घलो ख़तम हो जाये. ऐसन सब्बो बात ला किन्नर मन सुनें तो बहुतेच बने हो जाही.----

सुरक्षा से खिलवाड़


सुरक्षा से खिलवाड़


छत्तीसगढ़ में पिछला एक साल अपराध और ऐसी ही दूसरी घटनाओं के लिए चर्चा में रहा. अभी हाल ही में एक निजी इस्पात कारखाने में मालगाडी से ढुलाई के दौरान तोप के गोले मिलने से एक बार फिर हड़कंप मच गया है. जाहिर है ऐसी घटनाओं से यह तो समझा जा सकता है कि छत्तीसगढ़ में सुरक्षा के उपायों में कही न कही कुछ कमी तो रह जाती होगी. इससे पहले पिछले साल रायपुर में नक्सलियों के लिए लाये गए हथियारों का जखीरा पकडा गया था. कहने को राजधानी की पुलिस उस समय से मुस्तैद हो गयी ही, लेकिन उस मुस्तैदी का क्या परिणाम निकला यह भी नयी घटना से सामने आ गया है. राजधानी में एक निजी इस्पात कारखाने के कबाड़ में जो तोप के गोले पकडे गए है, वे यहाँ तक बिना जांच के कैसे पहुंचे, यह भी खोज का विषय होना चाहिए. जिस तरह की आपराधिक घटनाएं राजधानी में होने लगी हैं, उससे तो यह भी प्रतीत होता है कि राजधानी में बाहर से आने वाले सामानों की पड़ताल ठीक तरह से नहीं होती। कभी नक्सली साहित्य और सीडी कोइ विधायकों के विश्राम गृह तक दे जाता है, तो कभी जाली नोट बनाने और चलाने वाले गिरोह के सदस्य बैंक से लाखों रूपए कि हेराफेरी कर लेते हैं. पहले भी राजधानी के एक बैंक से तीन करोड़ रूपए से ज्यादा कि डकैती हो चुकी है. अभी पिछले दिनों स्टेट बैंक में तीन सौ साठ से ज्यादा नकली नोट निकले थे. पुलिस के अधिकारी भी जांच के दौरान ऐसे तथ्यों को उजागर करते हैं कि छत्तीसगढ़
अपराधियों के लिए एक आसन जगह बन गयी है. उत्तर प्रदेश और बिहार के अपराधी यहाँ आकर बड़े मजे से अपने काले कारनामों को अंजाम देते हैं और फिर छुपकर फरार हो जाते हैं. आपराधिक घटनाओं के लिए तो पुलिस के पास फिर भी कोई न कोई दलील जरुर होगी. लेकिन तोप के गोले मिलने कि घटना ने तो पुलिस कि सुस्त कार्यप्रणाली को सीधे ही बेनकाब कर दिया है. इस घटना से जल्द ही सबक लेने की जरुरत है, वरना छत्तीसगढ़ के शांत माहौल पर ग्रहण लगने में देर नहीं लगेगी.-----





Saturday, December 27, 2008

छत्तीसगढ़ में सेना भर्ती का उत्साह


छत्तीसगढ़ में सेना भर्ती का उत्साह


अक्सर यह कहा जाता है कि सेना में भर्ती के लिए सिर्फ़ सीमा प्रदेशों के ही युवा ज्यादा तैयार होते हैं. लेकिन हाल के वर्षों में छत्तीसगढ़ में भी जिस तेज़ी से युवाओं में सेना के प्रति लगाव बढ़ा है, उससे एक नई तस्वीर उभर कर सामने आई है. आज यहाँ के ग्रामीण युवा बड़ी तादाद में सेना भर्ती की रैली में आने लगे हैं. अभी पिछले दिनों वायु सेना की एयरमेंन भर्ती में इसका उदाहरण सामने दिखा. इसके अलावा राज्य के हीरो और एन.एस.जी. कमांडो दिनेश साहू ने भी रायपुर में एक कार्यक्रम के दौरान यह स्वीकार किया कि मुंबई में आतंकवादी हमले के बाद छत्तीसगढ़ के युवा भी अब सेना में शामिल होने के लिए पहले से ज्यादा उत्सुक दिखाई देते है. उनका यह कहना वास्तव में अनके युवाओं के लिए प्रेरणा का कारन बन सकता है. चूँकि ख़ुद दिनेश साहू ने मुंबई हमले में हिम्मत और हौसले के अपना काम करते हुए देश और प्रदेश का नाम रौशन किया है, इसलिए उनकी राय का महत्त्व भी है. अगर सेना की तीनो शाखाओं के बड़े अधिकारी चाहें तो वे दिनेश साहू को अपने ब्रांड एम्बेसडर के रूप में भी प्रस्तुत कर सकते हैं. निश्चित तौर पर यह उम्मीद की जा सकती है कि दिनेश की अपील पर हजारों युवा सेना में शामिल होने के लिए तैयार हो जायेंगे. इस नए सकारात्मक बदलाव के लिए मुंबई के हमले को भी जिम्मेदार माना जा सकता है. अच्छा तो तब होगा जब यह जोश सिर्फ़ दो- चार महीने तक ही न रहे और आगे भी छत्तीसगढ़ के युवा सेना में करियर बनाने के लिए उत्सुक रहें. वैसे अगर सच्चिदानंद वात्स्यायन अज्ञेय की बात को याद करें तो उन्होंने ने अपनी जीवनी में कहा था कि वेदना में अद्भुत शक्ति होती है. दुःख इंसान को दृष्टा बना देता है. शायद यही बात मुंबई हमले से पैदा हुई देश भक्ति पर भी लागू होती हो. अगर ऐसा भी है तो यह कुछ ग़लत नही है. इस एक दुःख ने अगर हजारों युवाओं को सेना में भर्ती के लिए उत्साहित कर दिया तो यह इस दुखद घटना का एक उजला पहलू भी मन जा सकता है. इसी के साथ हमे दिनेश साहू जैसे हौसलेमंद कमांडो को भी राज्य के हीरो के रूप में पेश करना चाहिए , उसको राज्य सरकार की ओर से भी प्रदेश के हर कोने- कोने में ले जाया जाए और वहा लोगों से उसकी मुलाकात कराई जाए. इस अभियान से भी राज्य में सेना भर्ती के प्रति उत्साह और बढेगा- इसमे कोई संदेह नहीं. ----------




Thursday, December 25, 2008

नक्सलियों से बातचीत की पहल


नक्सलियों से बातचीत की पहल


छत्तीसगढ़ में नयी सरकार बनते ही गृह मंत्री ननकीराम कँवर ने नक्सलियों से बातचीत की मंत्री पहल करके एक नयी शुरुआत की है. वैसे तो पिछली सरकार में स्वयं मुख्यमंत्री डॉ. रमण सिंह ने भी नक्सलियों से वार्ता करने की पहल की थी, लेकिन इस प्रस्ताव पर माओवादियों की तरफ से कभी कोई सहमती नहीं मिली. राज्य सरकार की इस बार की पहल में फर्क सिर्फ इतना ही है कि ननकीराम कँवर ने यह पहल कि है. कँवर के काम करने का पिछला अनुभव लोगों को याद होगा कि उन्होंने बालको के खिलाफ कैसे सख्त कदम उठाये थे. आखिर में राज्य सरकार ने खुद कँवर को ही मंत्री पद से हटा दिया था. गृह मंत्री का पद छत्तीसगढ़ में अब तक अभिशप्त रहा है. भाजपा की पिछली सरकार में दो मंत्री नक्सली घटनाओं के कारण ही अक्सर आलोचना के शिकार रहे. शायद यही सब देखकर इस बार मुख्यमंत्री ने कँवर के अनुभव और प्रशासनिक क्षमता को देखते हुए उन्हें गृह विभाग कि ज़िम्मेदारी दी है. कँवर ने अपना पदभार ग्रहण करते ही सबसे पहले बयान में नक्सली समस्या पर अपना नजरिया साफ़ किया है. एक तरफ उनका यह कहना कि सरकार बातचीत से इस समस्या का हल निकलना चाहती है, उनके व्यापक विचार को दर्शाता है . दूसरी ओर वे यह कहने से भी पीछे नहीं रहे कि नक्सली अपनी लड़ाई को बंद करने के लिए तैयार नहीं दिखते है. जब तक नक्सलियों का यह रवैया बना रहेगा, राज्य की पुलिस भी लड़ाई करने में कोई कसार नहीं छोडेगी. ऐसा लगता है कि कँवर अपनी शैली से कम करते रहे तो नक्सली मामले पर राज्य सरकार को जल्द ही कोई बड़ी सफलता मिलेगी. सबसे नयी बात यह भी है कि पुलिस के भ्रष्ट अधिकारी कँवर की कार्य शैली को जान लेने के बाद अपनी स्थिति में जल्द बदलाव का इंतज़ार करने लगे हैं. कँवर ने अपनी प्राथमिकता में भी यह बताया है कि वे पुलिस का मनोबल बढाने के लिए हर संभव कदम उठाएंगे. इसी के साथ कँवर ने सलवा जुडूम को भी चालू रखने कि बात कहकर नक्सलियों को संकेत दिया है कि राज्य कि योजना में कोई बदलाव नहीं होने वाला है. दखना यह है कि कँवर के बयान का नक्सलियों पर क्या असर होता है. एक आदिवासी को गृह मंत्री बनाकर मुख्यमंत्री ने भी राज्य कि जनता को यह जताने कि कोशिश कि है कि आदिवासी इलाके कि नक्सली समस्या को एक आदिवासी मंत्री बेहतर ढंग से समझ सकता है. अब यह कँवर के लिए भी एक परीक्षा कि घडी है कि वे अपनी नयी भूमिका में राज्य के नक्सल- प्रभावित इलाको के लिए किस तरह की सकारात्मक पहल कर पाते हैं ?


Tuesday, December 23, 2008

रमन - मंत्रिमंडल और असंतोष की चुनौती



छत्तीसगढ़ में मुख्यमंत्री डॉ. रमण सिंह ने अपना नया मंत्रिमंडल बना लिया है. लेकिन इसमें किसी ब्राह्मण को शामिल नहीं करने से बद्रीधर दीवान नाराज़ हो गए हैं. पिछली बार भी उन्हें मंत्रिमंडल में शामिल नहीं किया गया था. बाद में विधान सभा का उपाध्यक्ष बनाकर असंतोष को शांत करने की कोशिश की गयी थी. इस बार भी यही हुआ. वैसे मुख्यमंत्री ने अपने दुसरे कार्यकाल में कबिनेट गठित करते समय हर तरह के संतुलन का ध्यान रखा है. पार्टी को सबसे ज्यादा सीट दिलाने वाले आदिवासी वर्ग से पांच मंत्री बनाए गए हैं. इसी तरह पिछड़ा वर्ग को पर्याप्त प्रतिनिधित्व दिया गया है. यहाँ तक कि अग्रवाल समाज से भी मंत्री बनाने में मुख्यमंत्री पीछे नहीं रहे. लेकिन ब्राह्मण वर्ग से किसी को भी मंत्री न बनाकर उन्होंने असंतोष की एक चिंगारी को सुलगने का मौका तो दे ही दिया. दीवान का यह कहना कि ब्राह्मणों की इतनी उपेक्षा तो अजीत जोगी के कार्यकाल में भी नहीं हुई थी- वाकई सच मालूम पड़ती है. दीवान ने यह बयान भी दिया है कि यदि उनको विधानसभा अध्यक्ष का पद दिया जाता तो भी वे विचार कर सकते थे. परन्तु उन्हें इस लायक भी नहीं समझा गया. अब यह मुख्यमंत्री के लिए एक बड़ी चुनौती है कि वे ब्राह्मण वर्ग को कैसे शांत करते हैं ? आश्चर्य तो इस बात का भी है, कि जिस मुख्यमंत्री को सबसे संयम वाला मुखिया कहा जाता है, उनसे ऐसी भूल कैसे हो गई ? अगर ऐसे एक असंतोष को समय रहते शांत नहीं किया गया, तो यह आने वाले दिनों में और भी बड़े विरोध को जन्म दे सकता है. यहाँ भाजपा के बड़े नेताओं को भी सोचना चाहिए कि जब वे छत्तीसगढ़ में जातीय संतुलन बनाना चाहते हैं, तो उन्हें किसी भी एक वर्ग को शिकायत का मौका देना ही नहीं चाहिए. मंत्री बनने के लिए जब सभी वर्ग के नेता अपनी दावेदारी कर रहे हैं, तो सिर्फ एक ही वर्ग को क्यों उपेक्षित रखा जाये ? इससे न सिर्फ भाजपा के भीतर मुख्यमंत्री के इरोधियों को एक मुद्दा मिल जायेगा बल्कि कांग्रेस को भी आलोचना का एक अवसर प्राप्त हो सकता है. इसीलिए मुख्यमंत्री के सामने यह अहम सवाल है कि वे किसी भी नाराज़गी को उभरने का मौका ही न दें. देखना यह है कि आने वाले कुछ दिनों में भाजपा के नीतिकार और स्वयं मुख्यमंत्री क्या फैसला लेते है ?

Wednesday, December 17, 2008


सलवा जुडूम पर दो बातें


हाल ही में सलवा जुडूम पर दो अलग अलग बातें प्रकाश में आई हैं। एक तो यह कि छत्तीसगढ़ के मुख्यमंत्री डॉ रमण सिंह ने अपने दिल्ली प्रवास के दौरान कहा कि अपने दुसरे कार्यकाल में वे नक्सली समस्या का समाधान करना चाहेंगे. उन्होंने इस बात पर ही चिंता जतायी कि दिल्ली के कुछ सामाजिक कार्यकर्ता और मानवाधिकार कार्यकर्ता राज्य सरकार के कामकाज पर ऊँगली उठाते रहते हैं और नक्सलियों के खिलाफ कोई सख्त कदम उठाये जाने पर मानव अधिकार की बात करते हैं . उन्होंने इस बात पर भी ऐतराज़ जताया कि छत्तीसगढ़ में भाजपा सरकार के दोबारा सत्ता में आने के खिलाफ काफी माहौल बनाया गया था. रमण सिंह के अनुसार आदिवासी मतदाताओं ने अपने समर्थन से यह जता दिया कि वे भी सलवा जुडूम के माध्यम से नक्सली समस्या का स्थायी समाधान चाहते हैं . मुख्यमंत्री ने साफ़ तौर पर कह दिया है अब आदिवासी मतदाताओं से समर्थन मिलने के बाद सलवा जुडूम अभियान को और तेज़ किया जायेगा. सलवा जुडूम पर दूसरी बात केंद्र सरकार ने कही है. केन्द्रीय गृह राज्य मंत्री श्रीप्रकाश जायसवाल ने संसद में शाहनवाज हुसैन के एक सवाल पर जवाब देते हुए कहा है की केंद्र सरकार को राज्यों द्वारा नक्सली समस्या के समाधान के सलवा जुडूम जैसा कोई आन्दोलन शुरू करने पर कोई ऐतराज़ नहीं है. यहाँ तक कि यदि राज्य सरकारें नक्सलियों से बातचीत करना चाहें तो इस पर भी केंद्र सरकार को आपत्ति नहीं होगी. ज़ाहिर हैकेंद्रिय मनरी के इस जवाब से छत्तीसगढ़ सरकार को काफी संबल मिला होगा. क्योंकि सलवा जुडूम अभियान भले ही राज्य सरकार का अधिकारिक अभियान नहीं था, लेकिन इस अभियान को लेकर मीडिया में तो अक्सर यह बताया जाता रहा कि भजपा सरकार इस अभियान को परदे के पीछे से सहयोग दे रही है. अब मुख्यमंत्री रमण सिंह सलवा जुडूम पर तथा कथित राजनीति पर ऊँगली उठा सकते हैं. इस दौरान सलवा जुडूम पर एक और सवाल सुप्रीम कोर्ट ने किया है. अदालत ने छत्तीसगढ़ सरकार से जानना चाहा है कि उसने जनवरी तक नक्सली समस्या के निदान के लिए सलवा जुडूम अभियान के नाम पर क्या कदम उठाये हैं ? दरअसल, राष्ट्रीय मानवाधिकार आयोग ने अदालत को एक याचिका में यह बताया था कि राज्य सरकार ने सलवा जुडूम कार्यकर्ताओं द्वारा की गई कथित हत्याओं के मामले में कोई प्राथमिकी दर्ज नहीं की है. इस मामले में राज्य सरकार को जल्द ही जवाब देना होगा. बहरहाल, राज्य सरकार दोबारा चुनकर आने के बाद सलवा जुडूम के किसी भी मामले में अब ज्यादा अधिकार के साथ कार्य करने के तैयार दिखाई देती है, इसमें कोई शक नहीं है.

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Tuesday, December 16, 2008

Tuesday, December 9, 2008

राजनीति में विनम्रता की जीत

इस बार के विधान सभा चुनाव में पूरे देश में एक ख़ास बात मतदाता ने अपने मतदान से बता दी है की अब कोई भी नेता अपने आप को देश और जनता से बड़ा नहीं समझ सकता. यह वाकई बड़े अफ़सोस की बात रही है की आज़ादी के साठ साल बाद भी बहुत से नेता अपने आप को रियासत काल के राजा की तरह पेश करते है और नागरिकों को अपनी प्रजा समझते है। इस चनाव में जनता ने तथाकथित नेताओं को यह एहसास करा दिया की अब न तो नेता कोई राजा या उनके प्रतिनिधि हैं, और न ही जनता उनकी प्रजा .
दिल्ली में शीला दीक्षित की लगातार तीसरी बार जीत ने दिखा दिया की जनता को अब सिर्फ काम चाहिए . दिल्ली में भाजपा ने आतंकवाद का मुद्दा उछाला था, लेकिन जनता ने इसे पूरी अरह से नकार दिया इसी तरह राजाशन में वसुंधरा राजे सिंधिया की सख्त छवि और कड़क मिजाज शैली ने इन्हें जनता से दूर कर दिया
मध्य प्रदेश में शिवराज सिंह चौहान ने जब पदभार संभाला था तो उनके सामने सबसे बड़ी परेशानी यही थी की वे उमा भारती की कड़क छवि से हुए नुक्सान की भरपाई कैसे करें . उन्होंने अपनी सरल छवि से इस समस्या को काफी हद तक दूर भी किया इसी का नतीजा चिनाव परिणाम के रूप में सामने आया है । स्वयं उमा भारती का हार जाना भी जनता के इसी नजरिये को दर्शाता है की अब मतदाता अपने नेता की किसी सनक या तुनक मिजाजी को सहन नहीं करने वाला है .
छत्तीसगढ़ में भी रमण सिंह की कामयाबी के पीछे उनकी सौम्य छवि एक बहुत बड़ा कारन रही। दूसरी ओर कांग्रेस में कई नेता मुख्यमंत्री पद के दावेदार थे इसलिए जनता ने पार्टी को अपना समर्थन नहीं दिया ।
इस विधान सभा चुनाव में बड़े नेताओं की विनम्र छवि के आलावा अन्य नेताओं की छवि को भी मतदाताओं ने ध्यान में रखकर अपना वोट दिया है. इन परिणामों से इतना तो समझा जा सकता है की अब देश का मतदाता परिपक्व हो रहा है और उसे किसी तात्कालिक कारन से प्रभावित नहीं किया सकता. अब अगर नेताओं को जनता का समर्थन चाहिए तो उन्हें अपनी शराफत भी साबित करनी होगी तभी जनता का विश्वास उनके लिए वोट में तब्दील हो पायेगा. यह नयी परंपरा भारतीय लोकतंत्र की सेहत के लिए निश्चित रूप से एक शुभ संकेत है.


Sunday, December 7, 2008


छत्तीसगढ़ मेंचुनाव परिणाम से पहले


आज छत्तीसगढ़ में चुनाव के परिणाम आने के पहले सभी राजनीतिक दलों में भरी तनाव देखा गया - लेकिन कोई भी दल ये दावा नहीं कर सकता की उसकी जीत होने वाली है - एक तरफ कांग्रेस कह रही है की उसकी सरकार बनेगी, वहीँ भाजपा भी ऐसा ही दावा कर रही है- अब सरकार कौन बनाएगा ये तो कल यानि ८ दिसम्बर को ही पता चल पायेगा- तब तक अन्य्मान का घोड़ा दौडाने में क्या हर्ज़ है ? वैसे इस बार का चुनाव् कई मायनों में अनोखा रहा क्योंकि भरी मतदान हुआ और इसे परिवर्तन की लहर के रूप में देखा जा रहा है -

Friday, December 5, 2008

दबाव की राजनीति


दबाव ·ी राजनीतिछत्तीसगढ़ में विधानसभा चुनाव ·े परिणाम आने में अभी ·ुछ समय बा·ी है। फिर भी अगली सर·ार बनाने ·ी उम्मीद ले·र प्रदेश ·ांग्रेस ने अभी से दबाव ·ी राजनीति शुरु ·र दी है। छत्तीसगढ़ राज्य विद्युत मंडल ·े अध्यक्ष राजीब रंजन ·े खिलाफ लो· आयोग में भ्रष्टाचार ·ी शि·ायत ·रते हुए ·ांग्रेस ने यह साफ सं·ेत दे दिया है ·ि अगर पार्टी ·ी सर·ार बनती है तो विद्युत मंडल अध्यक्ष ·े बुरे दिन शुरु होने में देर नहीं लगेगी। ·ांग्रेस ·ा आरोप है ·ि निविदा जारी ·िए बिना ·ेवल एक्सटेंशन आर्डर ·े जरिए 115 ·रोड़ रुपए से अधि· मूल्य ·े मीटर खरीद·र विद्युत मंडल अध्यक्ष ने संविधान ·े अनुच्छेद 14 ·े साथ साथ ·ेन्द्रीय सतर्·ता आयोग, सर्वोच्च न्यायालय ·े आदेशों और राज्य विद्युत मंडल ·े नियमों ·े उल्लंघन ·िया है। मंडल अध्यक्ष ·े खिलाफ ·ांग्रेस इससे पहले भी लगातार मौ·ा ढूढती रही है ता·ि उन्हें ·टघरे में खड़ा ·िए जा स·े। इस मामले ·ा दूसरा पहलू यह है ·ि प्रदेश ·ांग्रेस प्रवक्ता ने सूचना अधि·ार ·े तहत मीटर खरीदी आदेश ·ी जान·ारी नि·लवाई और उसी जान·ारी ·ा इस्तेमाल ·रते हुए लो· आयोग ने शि·ायत दर्ज ·रा दी। इससे यह भी समझा जा स·ता है ·ि सूचना अधि·ार ·ा उपयोग ज्यादातर मामलों में मंत्रियों, अधि·ारियों या प्रभावशाली व्यक्तियों ·ी गड़बड़ी ·ो उजागर ·रने ·े लिए ·िया जाता है। या फिर उन पर दबाव बनाने ·े लिए भी इस अधि·ार ·ा प्रयोग ·िया जाता है। वजह चाहे जो भी हो, इस अधि·ार ·े ·ारण बहुत से भ्रष्टï मंत्री और अधि·ारी सचेत भी होने लगे है। बहरहाल, राज्य में सर·ार बनने से पहले ही ·ांग्रेस सत्ता हासिल ·रने ·ी आशा ·ो ले·र जिस तरह आगे बढ़ रही है। उससे ऐसा अनुमान लगाया भी जा स·ता है ·ि ·ांग्रेस ने सर·ार गठन ·ो ले·र अपने गुणा-भाग पूरे ·र लिये हैं। अब यदि ·िसी ·ारण से यह गणित सफल नहीं हुआ, तो भाजपा इसी मुद्दा ·ो ·ांग्रेस ·े खिलाफ इस्तेमाल ·र स·ती है।

Tuesday, December 2, 2008


विचार

मै अपने इस ब्लॉग में अपने स्तम्भ और समसामयिक घटनाओं पर विचार लिखना चाहता हूँ.