आज ‘’धान के कटोरे’’ की चमक देखेगी सारी दुनिया
प्रदेश में हर तरफ सनसनी छाई हुई. कहने
को बहुत कुछ है. प्रदेश में कांग्रेस की परिवर्तन यात्रा निकल रही है. प्रदेश के
मुखिया हैट्रिक की उम्मीद के पंख लगाकर विकास यात्रा पर निकलने वाले हैं. हजारों शिक्षाकर्मी
तनख्वाह बढ़ने का जश्न मना रहे हैं. इन सब ख़बरों के बीच भी रायपुर जैसे ठहर जाने को
बेताब है. अभी किसी को कुछ और नहीं सूझ रहा है. मंत्री, अधिकारी, मोहल्ले के नेता
और युवा पदाधिकारियों, छात्रों या फिर राह चलते किसी से भी इन दिनों आप और किसी बड़े,
जरुरी या गंभीर मुद्दे पर बात ही नहीं कर सकते. कुछ पूछो तो एक ही रटा-रटाया जवाब
आता है- “आई.पी.एल. के बाद”.
क्या जुनून है, और हो भी क्यों न? आई.पी.एल.
मतलब- घनी रात के बीच, कृत्रिम श्वेत-धवल रोशनी में क्रिकेट; नृत्य और ठुमके के
साथ खूबसूरत अदाओं की बिजली गिराने वाली चीयर गर्ल्स; रंगीन कपड़ों में मैदान पर
चौके-छक्के जड़ने वाले ‘’सितारा’’ की हैसियत रखते खिलाडी, कमेंटेटर की भूमिका में
नजर आती कालर-बोन दिखाने वाली नव-यौवना माडल और मैदान पर फील्डिंग करते खिलाड़ी से
लाईव (सीधी) बात करते हुए एंकर. भला एक साथ इतना रोमांच और कहाँ मिलता है? पैसे की
चमक और खनक से सांस लेने वाले बाज़ार की टकसाली जुबान में इसे ही तो कहते हैं- पैसा
वसूल.
अभी तक यही सब कुछ हम सब केवल टेलीविजन
के परदे पर ही देख रहे थे. लेकिन आज छत्तीसगढ़ में इतिहास लिखा जा रहा है. कौतूहल से
लबरेज और परी-कथाओं की कल्पना से भी खूबसूरत ग्लैमर का रंगमंच, यानी आई.पी. एल. तिलस्मी जादू आज समूचे
छत्तीसगढ पर छा चुका है.
कभी हाकी की नर्सरी की पहचान रखने वाला छत्तीसगढ
आज क्रिकेट के खुमार में डूबा हुआ है. अभी तक जिस राज्य की स्वतंत्र रणजी टीम नहीं
बन पाई है, वही छत्तीसगढ आज आई.पी.एल. जैसे अहम चैम्पियनशिप का गौरवशाली आयोजन कर रहा है. मुख्यमंत्री
और उनके मंत्री-अधिकारी के साथ क्रिकेट संघ और प्रशासन सभी की प्रतिष्ठा दांव पर
लगी हुई है. वाकई, क्रिकेट के अवतार और ग्लोबल ब्रांड सरीखे नामी करीब पचास खिलाडी,
दो से तीन हजार अंतरराष्ट्रीय हस्तियों का क्रिकेट परिवार और कारपोरेट कल्चर के नव-धनाड्य
नुमाइंदे- ये सभी आज उसी रायपुर में जमा हो रहे हैं, जिसे कभी पिछड़े कहे जाने वाले छत्तीसगढ की देहात जैसी
बस्ती का उपनाम दिया जाता था. यकीनन, समय करवट ले रहा है. छत्तीसगढ को अब खेल से प्रतिष्ठा
और मुकाम दोनों मिल रहा है. आज के बाद रायपुर वैसा नहीं रह जायेगा, जैसा वह अब तक
रहा है. मुख्यमंत्री और उनका सरकारी तंत्र सभी इस लम्हे को यादगार बनाने के लिए रात-दिन
एक किये हुए हैं. हो सकता है कि बहुतों के लिए रायपुर में आई.पी.एल. मैचों का आयोजन एक तमाशे से ज्यादा और कुछ न हो,
लेकिन राज्य के बहुत बड़े हिस्से के लिए यह जीने-मरने के सवाल से भी कहीं कमतर नहीं
है- गोया, उनकी जुबान पर इस वक्त यही अलफ़ाज़ अंगडाइयां ले रहे होंगे कि -
तुझे क्या सुनाऊँ ऐ दिलरुबा, तेरे सामने
मेरा हाल है.
तेरी इक निगाह की बात है, मेरी ज़िंदगी का
सवाल है
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